गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

आज मन को इतना उदास भी न होने दो 
मन यदि कहता है
थोडा सा खुश हो लेने दो तो
उसे खुश करने में कोई भी हर्ज़ नहीं है 
हम तो जीते ही इसलिए है की हमारा मन खुश हो सके 
आसमान  का रंग यदि लाल न हो तो क्या सुबह नहीं हुयी है 
कौन कहता है केवल हँसता हुआ चेहरा ही खुश होता है 
ये भी तो हो सकता है हँसता हुआ चेहरा भी 
अपने आप में दुखी हो 
हँसना केवल aपने  लिए ही नहीं होता 
दूसरो के लिए भी कभी कभी हँसना होता है
मन न भी चाहे तो भी दिखावे के लिए भी हसना पड़ता है 
यही तो ज़माने का वसूल है की
न चाहते हुए भी जो हँसे लोग usi को 
चाहते है नहीं तो क्या हजारो लोग रोते हुए भी हँसते हुए दिखाई यु ही देते है.

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

मेरे बारे में किसी ने क्या कहा
 इससे मेरे ऊपर कोई फर्क पढने वाला नहीं है. 
कितनो के लिए ही हम आपने मन को मार ले
यह भी तो सही नहीं हैं 
जीवन में   चलने से ही कुछ पाया जा सकता है 
चलने का नाम ही तो जीवन है
 जो रुक गया वो तो वही का होकर रह गया .
गति का नियम यु ही तो नहीं बना है
विज्ञान  जिसका समर्थन करे उसे फिर कैसे नाकारा जाय
बताने वाला तो यही बतलाता है कि
चलने मात्र से ही किसी मंजिल को पाया जा सकता है 
मुझे तो अज्ञेय की ये पंक्तिया ही सुहाती है -
'मैं तो हरिल हु बैठे रहना मेरे कुल का धर्मं नहीं *

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

aawaz ke jadoogar

स्वर के जादूगर का जाना  ऐसा लगता है
की जैसे  एक युग का अंत है.
ये आवाज दिल के किसी कोने में एक  एहसास को सहेज कर रखती है.
जब भी हम तन्हाई में होते है ये आवाज हमें अपने पास बुला लेती  है.
जब भी हम उदास होते थे ये आवाज़ हमें थाम   लेती थी.
इस आवाज का जाना बहुत तनहा कर कर लाखो लोगो को चली गयी.
कौन अब हमें अपनी मिटटी से जोड़ेगा
कौन हमें कागज़ की कश्ती की याद दिलाएगा   
किसकी आवाज़ में हम किसी अपने को बुलायेगे - रूठ कर जब चले जाओगे
अब तो ऐसा ही लगता है -
अपना गम लेके कही और न जाया जाये 
घर में बिखरी हुयी चीजो को सजाया जाये.

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

khamosh rat

खामोश रात तन्हाई सी बढती जाती है. 
बाहर   देखता हु तो कुछ भी नजर नहीं आता है.
सनाताते को बोलते हुए सुनना चाहता हु ध्यान लगा कर 
कान लगाकर कुछ तोह लेना चाहता हु
 मगर कुछ सुझाता नहीं 
शायद नज़र अब धुधली पड़ने लगी है.
समय का फेर है नहीं तो क्या क्या नहीं ताड़ येते थे अँधेरे में.
कोई भी डाली कोई भी फल या फिर कोई भी आवाज बच कर नहीं जा सकती थी अपने से.
आज फिर अक बार रात की ख़ामोशी में देखना सुनना चाहता हूँ
रात की  अनछुई  सुन्दरता को
अपने ह्रदय के अन्ह्करण में सहेज लेना चाहता हू
रात की ये ख़ामोशी, संनातात्ते और ये उंघते  लोगो की 
अजीब सी गधAई हुयी  रात अपने पास भी नहीं पटकने देती है.
रात की ख़ामोशी वास्तव में अजीब होती है.

अभी तो बस इतनी सी बात है की हम अपने घर से बहुत दूर है.
घर की chaह ने खा कहाँ कहा  नहीं भटकाया है.
कोई भी तो अपने साथ नहीं बस एक अपना साया है.
रात के अँधेरे में अपना साया भी कभी अजनबी सा दीखता है.
खुद की ही शक्ल पहचान में नहीं आती है.
देख लेते है जब आयना  तो सूरत रोनी सी बन जाती है.
हवा जब  चलती है तो  दिल को थोदा शुकून सा मिल जाता है.
ajeeब सा ख्वाब की सच होना चाहता है.
शायद इसे अभी ज़माने की खबर नहीं लगी है.


KHOON KA RANG

 आज सुबह सुबह आसमान  की ओर देखा तो
 ये समझ में नहीं आया की आसमान का रंग लाला क्यों लग रहा है.
शायद किसी न किसी शहर में गोली जरुर चली हैa
 जिससे आसमान भी लहूलुहान हो गया है.
 आसमान  का ये रंग जरुर कुछ न कुछ हमें बता रहा है 
कि ये रंग न तो हिन्दू का है न ही मुस्लमान का,
 न तो ये SIKH का है न ही ये किसी दलित का है 
यह तो मात्र इन्सान का है. 
आदमी के शरीर से निकलने के बाद
 इस रक्त का न तो कोई धर्म होता है और न ही कोई संप्रदाय.
 ये तो शुद्ध इन्सान का खून होता है 
जो  जिन्दा रहने पर नसों में उबल भर देता है.

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

MAN KI KUCHH APNI BAT


मन की बात कों करे मन तो हमेशा से ही चंचल रहा है . हम कही वि रहे घूम फिर कर वही आ जाते है जहा से चलना शुरू करते है. कहा जाता है की किसी जगह की यद् कभी भी समाप्त नहीं होती है.

ANUBHUTIYA JO SATH RAH YAYEE

जीवन ME JO KUCHH bHI MILA उसे अपने साथ ले कर चलअ   सतही के साथ न होने से जीवन की सब्झी गतिविधिया जसे सहम क्र रह गयी. अपने मन को बार बार छूना चाह मगर छो नहीं पाए ANTARMAN की उमध्ती घुमड़ती पीढ़ा को अपने आप से ही व्यक्त क्र देना ही क्या साहित्य नहीं है ऐसा विचार आते ही मन करता है किसी ऐसी जगह चला जाया जय जहा पर कोई अपना दिल थामे इंतजार क्र रहा हो अक दिन ऐसा आएगा वि कोई हमसे आकार कहेगा क्या जीवन की उलझन है जिससे तुम निकल नहीं सकते एक बार किसी कस लिए छड वर को सोच लिया की कितना