रविवार, 9 अक्टूबर 2011

khamosh rat

खामोश रात तन्हाई सी बढती जाती है. 
बाहर   देखता हु तो कुछ भी नजर नहीं आता है.
सनाताते को बोलते हुए सुनना चाहता हु ध्यान लगा कर 
कान लगाकर कुछ तोह लेना चाहता हु
 मगर कुछ सुझाता नहीं 
शायद नज़र अब धुधली पड़ने लगी है.
समय का फेर है नहीं तो क्या क्या नहीं ताड़ येते थे अँधेरे में.
कोई भी डाली कोई भी फल या फिर कोई भी आवाज बच कर नहीं जा सकती थी अपने से.
आज फिर अक बार रात की ख़ामोशी में देखना सुनना चाहता हूँ
रात की  अनछुई  सुन्दरता को
अपने ह्रदय के अन्ह्करण में सहेज लेना चाहता हू
रात की ये ख़ामोशी, संनातात्ते और ये उंघते  लोगो की 
अजीब सी गधAई हुयी  रात अपने पास भी नहीं पटकने देती है.
रात की ख़ामोशी वास्तव में अजीब होती है.

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