रविवार, 9 अक्टूबर 2011

अभी तो बस इतनी सी बात है की हम अपने घर से बहुत दूर है.
घर की chaह ने खा कहाँ कहा  नहीं भटकाया है.
कोई भी तो अपने साथ नहीं बस एक अपना साया है.
रात के अँधेरे में अपना साया भी कभी अजनबी सा दीखता है.
खुद की ही शक्ल पहचान में नहीं आती है.
देख लेते है जब आयना  तो सूरत रोनी सी बन जाती है.
हवा जब  चलती है तो  दिल को थोदा शुकून सा मिल जाता है.
ajeeब सा ख्वाब की सच होना चाहता है.
शायद इसे अभी ज़माने की खबर नहीं लगी है.


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