आज सुबह सुबह आसमान की ओर देखा तो
ये समझ में नहीं आया की आसमान का रंग लाला क्यों लग रहा है.
शायद किसी न किसी शहर में गोली जरुर चली हैa
जिससे आसमान भी लहूलुहान हो गया है.
आसमान का ये रंग जरुर कुछ न कुछ हमें बता रहा है
कि ये रंग न तो हिन्दू का है न ही मुस्लमान का,
न तो ये SIKH का है न ही ये किसी दलित का है
यह तो मात्र इन्सान का है.
आदमी के शरीर से निकलने के बाद
इस रक्त का न तो कोई धर्म होता है और न ही कोई संप्रदाय.
ये तो शुद्ध इन्सान का खून होता है
जो जिन्दा रहने पर नसों में उबल भर देता है.
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