शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

ANUBHUTIYA JO SATH RAH YAYEE

जीवन ME JO KUCHH bHI MILA उसे अपने साथ ले कर चलअ   सतही के साथ न होने से जीवन की सब्झी गतिविधिया जसे सहम क्र रह गयी. अपने मन को बार बार छूना चाह मगर छो नहीं पाए ANTARMAN की उमध्ती घुमड़ती पीढ़ा को अपने आप से ही व्यक्त क्र देना ही क्या साहित्य नहीं है ऐसा विचार आते ही मन करता है किसी ऐसी जगह चला जाया जय जहा पर कोई अपना दिल थामे इंतजार क्र रहा हो अक दिन ऐसा आएगा वि कोई हमसे आकार कहेगा क्या जीवन की उलझन है जिससे तुम निकल नहीं सकते एक बार किसी कस लिए छड वर को सोच लिया की कितना 

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