मेरे बारे में किसी ने क्या कहा
इससे मेरे ऊपर कोई फर्क पढने वाला नहीं है.
कितनो के लिए ही हम आपने मन को मार ले
यह भी तो सही नहीं हैं
यह भी तो सही नहीं हैं
जीवन में चलने से ही कुछ पाया जा सकता है
चलने का नाम ही तो जीवन है
जो रुक गया वो तो वही का होकर रह गया .
जो रुक गया वो तो वही का होकर रह गया .
गति का नियम यु ही तो नहीं बना है
विज्ञान जिसका समर्थन करे उसे फिर कैसे नाकारा जाय
विज्ञान जिसका समर्थन करे उसे फिर कैसे नाकारा जाय
बताने वाला तो यही बतलाता है कि
चलने मात्र से ही किसी मंजिल को पाया जा सकता है
चलने मात्र से ही किसी मंजिल को पाया जा सकता है
मुझे तो अज्ञेय की ये पंक्तिया ही सुहाती है -
'मैं तो हरिल हु बैठे रहना मेरे कुल का धर्मं नहीं *
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